भारत में सरकारी नौकरी

February 21, 2021 0 Comments

आरक्षण का दौर

वैसे इस लेख   को पढ़ने के बाद शायद लगेगा की इसका शीर्षक शायद आरक्षण होना चाहिए किंतु मैं आरक्षण पे अपने विचार व्यक्त करते हुए सरकारी नौकरी के बारे में कुछ कहना चाहूँगा ।

आरक्षण

१९५० में देश में समविधान के बनाने के साथ १० वर्ष के लिए आरक्षण की व्यवशतहा की गयी। उद्देश ये था की पिछड़े और अति पिच्छड़े वर्ग के लोग इसका लाभ लेते हुए उन सस्थानों में अपनी भागीदारी सुनिश्चित  कर सकेंगे जहाँ उनका प्रतिनिधित्व उनके पिछड़ेपन की वजह से सम्भव नही है। एक बार उनकी भागीदारी संस्थानो में सुनिश्तचित  होने के बाद संभवत उन्हें इस प्रकार के सहारे की ज़रूरत नहीं  होगी और समाज में अन्य वर्गों के समान ही उनका समानता का आचरण शुरू हो जाएगा।

जैसा की हम सभ जानते हैं की दस वर्ष के पश्चात आरखन की व्यवस्था को और १० वर्षों के लिए बाधा दिया गया और ये हर बार १० सालों के लिए बढ़त जाता है। आरक्षण vyavashtha  में अन्य वर्गों को जोड़ा गया और इसमें तमाम अन्य संशोधन किए गए। उइ सारे बातें सर्वविदित है आरक्षण के फ़ायदे नुक़सान पे बहस होती रहती है और वो मुद्दा थोड़ा संवेदनशील है। मैं इस बात में नहि जाता की आरक्षण अच्छा है समाज के लिए या बुरा क्यूँकि इसके बारे में डोनो पक्षों के अपने तर्क है।

भरतिया समाज में पिछले कई सालों से जो मुद्दे लगातार बहस का विषय रहे हैं आरक्षण उनमें से एक है। पिछले दिनों प्राइवट सेक्टर में आरक्षण की बात हो रही थी कुछ सक्रियतवों के बाद बात आयी गयी हो गयी।
मैं इस बात के मूल में जाना चाहता था की लोग सरकारी नौकरियों में आरक्षण को लेके इतने सचेत और संवेदनशील क्यूँ है।

आरक्षण और रोज़गार

संभवतक एक पहलू जो आरक्षण से जुड़ा है वो ये है की समाज के वो लोग जिन्हें रोज़गार के अवसर नहि हैं उनके लिए आरक्षण सहायक हो सकता है अगर वो ऐसे तबके से आते है जो पिछड़ा है। अगदी जाती वाले लोग ज़्यादा प्रशिक्षित और क़ाबिल और अगर आरक्षण ना दिया गया तो सारी नौकरियाँ इन अगड़ो को मिल जाएँगी। इस तर्क के आधार पर जो बात सबसे पहले दिमाग़ में आती है वो ये की अगर सभी नौकरी खोजने वालों के लिए सरकार नौकरी की व्यवशतहा कर दे तो शायद आरक्षण की आवश्यकता ना पड़े। इस बात को ध्यान में रखते हुए संभवत लोगों की माँग होनी चाहिए की सरकार सबको रोज़गार दे ना की लोगों को आरक्षण दे । किंतु ऐसा नहि है । ऐसा तर्क रखने वाले लोग भूल जाते हैं की सारी नौकरियाँ समान नहि होती है। जो नौकरियाँ आरक्षण से आती है वो बहुत ख़ास होती है और उन्हें सब पाना चाहते हैं ऐसी क्या ख़ास बात है इन नौकरियों में ? दरसल ये नौकरियाँ सरकारी होती है।

अब हम आते हैं इस आलेख के मुख्य विषय पे। क्या ख़ास बात होती है आख़िर इन सरकारी नौकरियों में ? आइए इसका पता लगाएँ।

आरक्षण और शिक्षा क्षेत्र

इसके पहले की हम सरकारी नौकरी की विशसहटवों के बारे में बात करें थोड़ा सा हम बात करते हैं शिक्षा क्षेत्र में आरक्षण की ख़ास तौर पे सरकारी एंजिनीरिंग और मेडिकल कॉलेज में आरक्षण कीप्राथमिक । सरकार ने प्राथमिक शिक्षा के लिए पूरे प्रयत्न किए है और इसका परिणाम ये है की जो भी बच्चा पढ़ने लायक उम्र का है उसे प्राथमिक शिक्षा किसी ना किसी रूप में मिल जाती है।किंतु प्राथमिक शिसख के बाद देश की ग़रीबी हमारे आड़े आ जाती है। अभी भी हम अपने सारे बच्चों को वो नहि दे सकते हैं जो वो करना चाहते है। हमारे देश के बच्चे डॉक्टर या एंजिनीर बनाना चाहते है और हमारे पास उतनी सीटें नहि हैं बच्चों को आवंटित करने के लिए जितने की बच्चे है। यहाँ से देश के ग़रीबी आड़े आना शुरू होती है और हम चुनाव शुरू करते है उन बच्चों का जिन्हें की हमारे पास उपलब्ध सीटें देनी है।आप को बहुत होशियार होने की ज़रूरत नहि है ये जानने के लिए की अगर लोग ज़्यादा है और आपको पास उनको देने के लिए चीज़ें कम है तो कुछ लोग हमेशाख़ाली हाथ रहेंगे । मैं इस तर्क
के आधार पे आरक्षण को जायज़ नहि ठहरा rha पर इस बात को रेखांकित करना चाह रहा हूँ की अगर हमारे पास पर्याप्त संसाधन हो तो एक सामाजिक समस्या से मुक्ति पायी जा सकती है। दूसरी बात जो यहाँ उतनी स्पष्ट नहि हो रही है पर जिसे हमें शयन में रखना है वो ये की १२वी क्लास के बाद ज़्यादातर बचे एंजिनीर या डॉक्टर क्यूँ बनाना चाहते है ? एक बात ये है की उन्हें बाक़ी विषय जैसे कला ,इतिहास ,मन्विकी ,मनोविज्ञान इत्यादि में अपने भविष्य का उतना अच्छा स्कोप नहि दिखता। ये माहौल अभी बदल रहा है किंतु लोगों के इन क्षेत्रों में उदासीनता की वजह अपने आप में एक अलग सवाल खड़ा करती है और वो एक दूसरी विस्तृत व्याख्या का विषय है ।

सरकारी नौकरी

अब हम आते हैं सरकारी नौकरी पे और उन बिंदुवों पे सरकारी नौकरी की जो इसे बाक़ी नौकरियीं से ज़्यादा आकर्षक बना देती है। ध्यान देने योग्य बात ये है की ये वो बातें है जिनके दुशपरिणाम हमारा समाज झेलता है और कई पहलूँ इन चीज़ों के वो है जाया हमारा व्यागतिगत स्वार्थ सीधे सामाजिक हित से टकराता है । और कई जगहों पे इस टकराव को संस्थागत सहमति प्रदान कर दी गयी है।

बड़े और जटिल तंत्र जैसे की हमारा प्रशाहन कई शाखावों में बनता होता है और हर शाखा में मुखिया से लेकर कार्यकर्ता तक कई स्तर होते है और हर स्तर पे एक ज़िम्मेदार व्यक्ति नियुक्त होता है। हमारा तंत्र कितना प्रभावशाली है इस बात का अंदाज़ा इस से लगता है की हर स्तर पे बैठा व्यक्ति कितनी ज़िम्मेदारी से अपना काम कर है अगर पर तंत्र लचर है तो वो अपने उद्देशों की प्राप्ति में कभी भी सफल नहि हो सकता

सरकारी नौकरी और समाज सेवा

ये सोचा जा सकता है की सरकारी नौकरी जो ना की सिर्फ़ सरकारी कोंपनियों से जुड़ी है बल्कि सरकारी प्रशासन तंत्र से भी जुड़ी है वो देश के नागरिकों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जोड़ने का और उनके हितों से सम्बंधित निर्णय लेने का मौक़ा देती है। कई नौजवान लोग इस मौक़े का इस्तेमाल कर देश की तरक़्क़ी में भागीदार बनाना चाहते है और सरकारी नौकरी उन्हें इस बात का पूरा मौक़ा देती है।

सरकारी नौकरी और भ्रष्टाचार

संभवत अब स्थिति ऐसी नहि है परंतु ८० की दहाई के अंत तात्कालिक प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी जी ने कहा था अगर वो कोई बहुत बड़ी रक़म देश के ग़रीबान को भेजते हैं तो उसका बहुत छोटा हिस्सा उन तक पहुँचता है । जैसा की हमने देखा की सरकारी तंत्र जिसकी ज़िम्मेदारी देश के नागरिकों के हितों को ध्यान में रख के उनकी उनके भलाई के कामों का कुशलता से अनुपालन करना है ,अगर अपनी इस ज़िम्मेदारी के बजाय लोगों के भलाई की सुविधावो के लिए दिए गए धन को अपने खाते में डालने लगता है तो एक प्रकार का भ्रष्टाचार पैदा हो सकता है। ये

सरकारी नौकरी और ऊपरी कमाई

घूस लेना आपको लगता होगा की बुरी बात है पर हमेशा नहि है । वो परिवार और समाज के व्यक्ति जिन्हें घूस मिलता है वो इसे ऊपरी कमाई बोलते है और ये काफ़ी सम्माजनक शब्द है ।आपको लगता होगा की सामाजिक दोगलापन है किंतु ये वो वजहें है निंकी वजह से समाज में घूस लेने के विरूदह आम सहमति नहि बान पा रही ह। लोग दूसरों को घूस नहीं देना चाहते पर ख़ुद की ऊपरी कमाई उन्हें शायद उतनी बुरी नहि लगती।यहाँ इस बात का एक दूसरा पहलू ये है की कई बार लोग सामान्य प्रक्रिया जो बहुत धीमी और अप्रभावि है उससे बचना चाहते है। उनका उद्देश सिस्टम के लूपहोल खोज कर अपना काम बाक़ी लोगों से जल्दी करना होता है। इस विशेष सुविधा के लिए शुल्क देने को तैयार होते है। इसलिए रिश्वत या घूस का दूसरा नाम सुविधा शुल्क भी रखा गया है। इस प्रक्रिया की समस्या यह है की ये शुल्क सरकारी ख़ज़ाने में ना जाकि अधिकारियों के व्यक्तिगत ख़ज़ाने में जाता है।

सरकारी नौकरी और सामाजिक प्रतिष्ठा

सरकारी नौकरी हमेशा से सामाजिक प्रतिष्ठा का पर्याय रही है । सरकारी पदाधिकारी जो की देश की जनता से सीधे सम्पर्क में रहते है उनका बहुत प्रभाव उन लोगों के हितों पे रहता है जिनसे वो सम्पर्क करते है।भारत जैसे देश में जहाँ बहुत सारे लोग ग़रीब रहे है वहाँ एक पदाधिकारी के पास उन ग़रीब लोगों का भविष्य नियंत्रित करने का पूरा चान्स रहता है। देश और समाज की तरक़्क़ी इन पदाधिकारियों से ईमानदारी और कर्त्व्यपरयनता की माँग करती है और साथ ही ये मौक़ा भी देती है की उन ग़रीब लोगों का फ़ायदा उठा कर उन्हें अपने हित के कार्य किए जाएँ ।प्रधानमंत्री जी द्वारा भेजे गए १०० पैसे पूरे के पूरे उन लोगों तक पहुँचाये जायँ जिनके लिए भेजे गए है। आप समझ सकते है की इस व्यवशथा में अधिकार पे पद पे बैठा आदमी लोगों के लिए कितना महत्वपूर्ण हो जाता है।वो ना सिर्फ़ आदर का पात्र ही जाता है बल्कि लोगों के माँ में उसके प्रति एक डर का भी भाव रहता है और ये उस व्यक्ति को समाज में अलग स्थान दिला देता है।

सरकारी नौकरी और पद का दुरुपयोग

जैसा की हम देख सकते है की सरकारी पदों के बैठे व्यक्तियों के हाथ में पर्याप्त अधिकार होते है । उन व्यक्तीयों और अधिकारियों और कर्मचारियों के काम को देखते हुए ये अधिकार अति आवश्यक है उसके बिना वो अपने कर्तव्योंब का निर्वाह ठीक से नहि कर सकते हैं ।जहाँ ये अधिकार हमारे समाज के ज़िम्मेदार अधिकारीयों के लिए समाज की सेवा का अवसर ले कर आते है वहीं अधिकार का पद लाभ का पद भी बन जाता है। ये लाब सरकारी अधिकारियों द्वारा कई तरह से उठाए जा सकते है।

सरकारी नौकरी और जॉब गैरंटी

सामान्यतः यह समझा जाता है की सरकारी नौकरी सुरक्षित होती है। अन्य प्राइवट नौकरियों की तरह इसमें से आपके निकाले जाने का ख़तरा कम होता है ये बात सत्य है परंतु आपको सोचना चाहिए ये अवधारणा किस आधार पे आती है।सामान्यतः जब प्राइवट नौकरी से किसी व्यक्ति को निकला जाता है तो उसका अर्थ होता है या तो व्यक्ति अपनी क्षमता के हिसाब से काम नहि कर रहा है या उसकी कुशलता की आवश्यकता प्राइवट कम्पनी को नहि है या कम्पनी की आर्थिक स्थिति अछी नहि है और कुछ लोगों को निकलना उनकी मजबूरीहै। इस प्रकार की विशेष परिस्थितियों में कोई कम्पनी अपने कर्मचारियों को निकालने के लिए बाध्य होती है ।
अब हम सरकारी नौकरी पे आते है। यहाँ अपेक्षा यह है की भले ही व्यक्ति अपनी क्षमता के हिसाब से काम ना कर रहा हो या सरकारी कम्पनी घाटे में जा रही हो या फिर व्यक्ति को किसी व्यक्ति के लिए उपयुक्त काम सरकारी विभाग में उपलब्ध नहि है , सरकार को हर परिश्तहिति में सरकारी ख़ज़ाने से उस व्यक्ति को उसका मासिक वेतन देते रहना चाहिए।

इस प्रकार की व्यवस्था के पक्ष में और विपक्ष में लोगों के तर्क हो सकते है पर सरकारी नौकरी का ये पहलू इसे प्राइवट नौकरियों से ज़्यादा आकर्षक बना देता है।

सरकारी नौकरी और पारदर्शिता

जैसा की हमने देखा सरकारी नौकरी लोगों के अपने मूल उद्देश से भटक जाने के पर्याप्त अवसर है। पारदर्शिता इस सिस्टम में ऐसी चीज़ है जो की लोगों को उस राशते पे जाने से रोकती है जिसमें व्यक्तिगत हित को सामाजिक हित पे वरीयता दी जाती है।

सामाजिक झुकाव

जैसा की सरकारी नौकरी के प्रति समाज की भावना को देख कर आप समझ गए होंगे की क्यूँ सरकारी नौकरियों में आरक्षण की माँग क्यूँ इतने पुरज़ोर तरीक़े से की जाती है। लोग सरकारी नौकरियों में अपनी भागीदारी विभिन्न वजहों से सुनिश्चहित करना चाहते हैं ।कुछ लोग समाज और देश सेवा की भावना से इन नौकरियों से जुड़ते है और कुछ अन्य वजहों से पर भारत में सरकारी नौकरी का आकर्षण अभी तक बरक़रार है । संभवत ये वो वजह जिस वजह से लोग आरक्षण जैसी चीज़ों को सवेंदनशील मुद्दे की तरह देखते हैं ।

सरकारी नौकरी की उपलब्धता

https://data.gov.in पर उपलब्ध सरकारी आँकड़ों के हिसाब से २००१ से २०११ तक सरकारी नौकरियों की संख्या या तो लगभग समान रही है या फिर काम हुई है ।नीचे के ग्राफ़ राज्यों के हिसाब से ये ब्योरा आप देख सकते हैं । जबकि जनसंख्या और रोज़गार चाहने वालों की संख

्या लगातार बढ़ी है। देश में रोज़गार के बढ़ते अवसरों को देखकर कहाजा सकता है की लोग सरकारी नौकरियों की जगह प्राइवट जॉब में ज़्यादा जा rhe है।

निष्कर्ष

इस चर्चा में मेरा उद्देश यथा स्थिति को रेखांकित करना है।मैं आशा करता हूँ की पढ़ने वाले लोग समझदार होंगे और वो ख़ुद इस बात का फ़ैसला कर सकेंगे की हमारा समाज और उसके ज़िम्मेदार लोग जो विकल्प चुन सकते थे उनमें से उन्होंने किस विकल्प को चुना है ।सरकारी नौकरी शायद हमारे जैसे विकाश शील देश में उससे अधिक महत्व रखती है जितना की ये शब्द उसको परिभाषित करते है ।और हमारे समाज के ज़िम्मेदार नागरिक जो सरकारी नौकरी करते हैं उन्हें शायद अपने हर एक कार्य के साथ ध्यान रखना चाहिए की इससे सिर्फ़ उनका नहि बल्कि बहुत सारे लोगों का भविष्य जुड़ा हुआ है । वो भी सोच सकते है हमारा ख़ुद का भी भविष्य इससे जुड़ा हुआ है।

जैसे जैसे सरकारी अहसारों की जवाबदेही के प्रति जनता जागरूक होगी और व्यवशथा की पारदर्शिता बढ़ेगी वैसे वैसे सरकारी अन्य नौकरियों से अलग नहि रहेगी और लोग आरक्षण की माँग कर किसी भी प्रकार सरकारी नौकरी पाने की जगह उनकी कुशलता के हिसाब उपलब्ध रोज़गार का चुनाव करने में ज़्यादा ध्यान देंगे।

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